Sunday, March 4, 2012

कमरों में कॉमरेड बैठे

कमरों में कॉमरेड बैठे हैं,
सड़कों पर खून बह रहा है।
क्रांति तो किताबों में बंद है,
खुले हैं किवाड़े इतिहासों के।
नारों की फसल उगे हैं होठों पर,
सौ टुकड़े होते विश्वासों के।
हरे भरे सपनों की कौन कहे,
जंगल में गीत दह रहा है।
लाशों को चीत रहे कौओं की,
अपनी क्या जात कहीं होती है।
दिन पर दिन बढ़ रहे नाखूनों की,
कोई तारीख नहीं होती है।
सन्नाटा मौसम पे भारी है,
कितना कुछ शब सह रहा है।
सूरज के माथे पे पसीना है,
सुबह कहीं कोई अफवाहों में।
थर थर कांपती मुंडेरे हैं,
सहमी है धूप कत्लगाहों में।
बदलेगा ये सबकुछ बदलेगा,
मूरख है कौन कह रहा है।
-यश मालवीय

२१वी सदी की रथयात्रा

भेड़िये अब धम्मम शरणं गच्छामी का जाप करते हुए,
नगर के प्रवेश द्वार तक आ पहुंचे हैं।
अनुरोध के अनुसार पहला समागम,
मेमनों के मुहल्ले में होगा।
अरे नहीं डर कैसा,
देखते नहीं उनका पवित्र पीताम्बर।
शुभ्र यज्ञोपवित्र हवा की बेलौस चाल में ,
पताका सी फहराती रामनामी।
अमन का राग गाती स्निग्ध वाणी,
कैसा दिव्य आलोक है मुख मंडल पर।
औह कैसा तेजोमय रूप है,
धन्य भाग धन्य भाग।
-प्रियंकर पालीवाल

Tuesday, February 21, 2012

एक अच्छी कविता

अरसे बाद एक बहुत अच्छी कविता सुनी। शुद्ध कविता कह लीजिए।वो भी किसी न्यूज़ चैनल के प्राइम टाइम कार्यक्रम में। बहुत बेहतरीन सबको अच्छी लगेगी

सवाल प्यार करने या न करने का नहीं था दोस्त
सवाल किसी हां या ना का भी नहीं था
सवाल तो यह था कि उन आंखों में हरियाली क्यों नहीं थी
और क्यों नहीं थी वहां खामोश पत्थरों की जगह एक झील
सवाल मिलने या ना मिलने का नहीं था दोस्त
सवाल खुशी और नाराजगी का भी नहीं था
सवाल तो ये था कि एक उदास तख्ती के लिए क्यों नहीं थी
दुनिया भर में कहीं कोई खड़िया मिट्टी
और क्यों नहीं एक भी दूब इतने बड़े मैदान में
सवाल ताल्लुकात रखने या मिटा देने का नहीं था दोस्त
सवाल ज़रूरत या ग़ैर जरूरत का भी नहीं था
सवाल तो ये था कि इतनी बड़ी दुनिया में कोई इतना अकेला क्यों था
और क्यों नहीं था उसके पास एक भी सवाल इतनी बड़ी दुनिया के लिए

-घनश्याम कुमार देवांश

Monday, February 6, 2012

ये कहां आ गए हम ...


मदर इंडिया में एक मशहूर गीत है ... घूंघट नहीं खोलुंगी पिया तोरे आगे ... । गीत का फिल्मांकन इस रुप में है कि नायिका नायक को ये बताना चाहती है कि दोनों की सगाई पक्की हो गई है। लेकिन मारे लाज के वो बता नहीं पा रही। तमाम लटके झटकों और ज़ोर जबरदस्ती के बाद जब नायक नायिका को ख़ुद की कसम देता है। तो नायिका उसे इशारों में अंगुलियां जोड़कर बताती है कि सगाई पक्की हो गई। निर्देशक महबूब ख़ान ने न केवल फिल्म के साथ इंसाफ किया है । बल्कि तत्कालीन भारतीय समाज को खूबसूरती से उकेरा है। ये 1957 की बात है जब मदर इंडिया रिलीज हुई थी। आज वक्त दूसरा है। अब इज़हार साफ साफ होता है। कट टू कट का ज़माना है। सीधे मन की बात कह दो। मान गए तो ठीक न माने तो भी ठीक। आज हर जेब में मोबाइल है तुरंत फोन कर के प्यार जता दो। मेरे कई दोस्त हैं जिन्होंने प्यार का इज़हार मेल करके किया था। अगले हफ्ते वैलेनटाइन डे है। अब बाबा वैलेनटाइन ने क्या सोचा था और प्रेम की परिभाषा उनके मन में क्या थी ये तो नहीं मालूम । लेकिन आज के माहौल में उनके नाम पर जितना प्रेम का तमाशा होता है और किसी दिन किसी के नाम पर नहीं होता। एक बात बड़े ही साफ तौर पर कहना चाहता हूं कि हमें न तो प्रेम दिवस से विरोध है। और न इज़हार करने के आज के तरीके से। हमें विरोध है उस बाज़ार से जो वैलेनटाइन जैसे विशेष अवसरों की आड़ में हमारी सभ्यता , संस्कृति , अर्थव्यवस्था और राजनीति पर हमले कर रही है। एक एक कर मान्यताएं और परंपराएं दरकती जा रही है और हम उत्सव मना रहे हैं। अपना पहनावा गया , अपने तर्क गए अपनी बोली गई और अब अपनी पहचान जा रही है। और हम भारतवासी इसे बदलाव मान रहे हैं।

आज चीजें बदली हैं , लिहाज़ा मान्यताएं और परंपराएं भी बदली है। कुछ लोग कहते हैं कि ये बदलाव इसीलिए जरूरी है क्योंकि जो समाज बदलता नहीं वो बिखर जाता है। बावजूद इसके परिवर्तन पर बहस समाप्त नहीं हो जाती। हम अगर बदल रहे हैं और आगे बढ़ रहे हैं तो कभी कभी ठिठककर ये भी सोचना चाहिए कि हम क्या होते जा रहे हैं और किस तरफ आगे बढ़ रहे हैं। अगर हम बिना सोचे समझे यूं ही खुद की पीठ थपथपाकर आगे बढ़ते रहेंगे तो संभव है संस्कृति के साथ साथ सभ्यता पर भी बड़ा संकट खड़ा हो जाए। आज इस बात की बहुत जरूरत है कि हम ये सोचे कि हम किधर जा रहे हैं ? क्या ये रास्ता उन्नति का रास्ता है? करोड़ों भारत के लोगों के हित साधनेवाला रास्ता है भी या नहीं। इन प्रश्नों का जवाब पूछने का वक्त आ गया है।

दुनिया में मॉडल बनाकर पेश की गई पश्चिम की सभ्यता और हमारी भारतीय सांस्कृतिक विरासत में बहुत बुनियादी फर्क है। पश्चिम के लोग अपनी जरूरतों बढ़ाते रहे। और बढ़ी हुई जरूरतों को पूरा करने के लिए लड़ाईयां लड़ते रहे, लोगों को शोषित करते रहे, उपनिवेश स्थापित करते रहे। आज के समय में जब हथियारों से किसी राष्ट्र की संप्रुभता को अपनाया नहीं जा सकता तो हरावल दस्ते की कमान बाजार ने संभाल ली है। जबकि हमारी सभ्यता ठीक पश्चिम के उलट रही है हमने अपनी ज़रूरतों को कभी बढ़ाया नहीं। और इच्छाओं में कमी कर हमने अपनी संप्रुभता और स्वतंत्रता को प्राथमिकता दी। हमारे लिए आत्मबल महत्वपूर्ण था न कि भौतिक संपत्ति। लेकिन आज का समाज मूल भारतीय आत्मा की उलटी दिशा में जा रहा है। दिक्कत संपन्नता से नहीं है लेकिन ये तो पूछा ही जाना चाहिए कि संपन्न कौन कौन होगा और किन परिस्थितियों में होगा।

हर पखवाड़े कोई न कोई दिन आ धमकता है, जिसे मनाने के बहाने कई कंपनियों की खूब कमाई हो जाती है। और मीडिया से लेकर महफिलों में जो तमाशा बनता है वो अलग। मदर्स डे , फादर्स डे , ब्रादर्स डे, सिस्टर्स डे , से लेकर फ्रेंडशिप डे तक मनाया जाता है। क्योंकि एक दिन जितना चाहो भावुक हो लो। जितने रिश्ते निभाने हों निभा लो , बाद में तो इन सबका कोई स्थान नहीं। तरक्की के लिए तो पश्चिम वालों ने पूरी दुनिया का पारिस्थितिक तंत्र बिगाड़ दिया है। हमारे देश में भूमंडलीकरण के बाद जितनी चोट रिश्तों पर की गई है, उतनी शायद ही और कहीं हुई हो। वै·ाीकरण के बाद हमारे त्योहार धीरे धीरे अप्रासंगिक होते जा रहे हैं। और जो नया रूप निकलकर सामने आ रहा है वो केवल बानगी भर है। उदाहरण के लिए अब दीवाली में ज्यादा कीमती पटाखे मिलते हैं, दीवारों को रंगने के लिए महंगे पेंट बाज़ार में उपलब्ध है। लेकिन अब बाहर के रहने वाले घर नहीं लौटते। होली में हर घर में पश्चिमी व्यंजन बनने लगे होंगे लेकिन घर घर जाकर सुख दुख बांटने का रिवाज उठ गया। पर्वों की प्राचीन परंपरा उजड़ने का सीधा असर हमारी वैचारिक आज़ादी पर पड़ा। नतीज़ा हमारी पीढ़ी भारतीयता से कटने लगी। हिन्दुस्तान का समाज हिन्दुस्तान का भूगोल और हिन्दुस्तान का इतिहास धीरे धीरे अंग्रेजी पाठ¬क्रमों में सिमटने लगे। और देखते ही देखते एक ऐसी पीढ़ी तैयार हो गई जिसने पश्चिम की सभ्यता को ही अपना स्वीकार कर लिया ।
देश में लोकशाही है और बिना किसी ग़ैरबराबरी के संपन्नता की लड़ाई हम सालों से लड़ रहे हैं। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक और कामरूप से लेकर कच्छ तक के इतने बड़े मुल्क में तमाम समस्याएं हैं। बजाए बदलाव का उत्सव मनाने के हमें उन कमियों को ईमानदारी से स्वीकार करना होगा जो आज़ादी के इतने बरसों बाद भी हमारे समाज में मौजूद हैं।ये सारे सपने कभी बापू ने भी देखे थे। इसलिए उन्होंने हिन्द स्वराज को भारत निर्माण का नक्शा कहा था। और हिन्द स्वराज का मूल स्वर ये है कि भारत का समाज भारतीय परंपराओं को मानते हुए भारतीय तरीके से उन्नत बन सकता है। न कि अंधाधुंध पश्चिमी अनुकरण से। जिसे आज कल हमारे देश में आधुनिकता कहते हैं वो पाश्चत्य से ज्यादा और कुछ भी नहीं ।
- राजेश कुमार

Wednesday, February 1, 2012

घोषणाओं की ज़मीनी हक़ीकत



एक बहुत पुराना शेर है , ... तेरे वादे पे जिये हम जो ये जान झूठ जाना ... कि खुशी से मर न जाते अगर एतबार होता ... ये शेर उत्तर प्रदेश के ताज़ा राजनीतिक हालात पर सटीक बैठता है। अगर मीडिया में मचाए जा रहे माथा फुटौव्वल को छोड़ दें तो उत्तर प्रदेश को लोग अलग अलग राजनीति दलों के घोषणा पत्रों को गंभीरता से नहीं ले रहे। हां कांग्रेस और संघी फांको में कटे समाज के तथाकथित वे बुद्धिजीवी जिनका यूपी चुनाव से दूर दूर तक का कोई लेना देना नहीं है , वे इस घोषणापत्र को ज़रूर गंभीरता से ले रहे हैं। ये बुद्धिजीवी यूपी की ज़मीनी हकीक़त से जितनी दूर हैं उतना ही दूर राजनीतिक दलों का घोषणापत्र आम लोगों से है।
जितनी मेरी उम्र है और जितना इस देश की सियासत को जान पाया हूं, एक दावा तो कर ही सकता हूं कि हमारे बिहार की तरह उत्तर प्रदेश में भी कोई चुनावी घोषणापत्र पढ़कर वोट नहीं करता। बस इसी बात का फायदा उठाया सभी राजनीतिक पार्टियों ने , और वे वचनं किं दरिद्रता की उक्ति पर उतर गए। रोजी ,, रोटी ,, सिंचाई ,, पढ़ाई और दवाई से गुजरते हुए चुनावी वायदे कब टेबलेट कंप्यूटर और स्वास्थ्य लोकपाल तक पहुंच गया पता ही नहीं चला। अब कांग्रेस को ये कौन बताए कि जो असली लोकपाल अटका है उसकी सेहत क्या यूपी की समाजवादी या फिर बहुजन समाज पार्टी दिल्ली में जाकर दुरूस्त करेगी। बीजेपी अभी इसलिए व्यस्त दिख रही है क्योंकि उसकी पूरी ताकत तमाम दागियों के काले कारनामों को भगवा पर्दों में ढंकने में लगी है।

जब से तमाम पार्टियां चुनावों से ठीक पहले रंगीन चुनावी घोषणा पत्र जारी करने लगी। तब से हवाई घोषणाओं का अंबार लग गया । जनता चुनाव दर चुनाव धोखे खा रही है इसीलिए वो अब चुनावी वादों को गंभीरता से नहीं लेती। लेकिन इसके बाद भी आयोग की ज़िम्मेदारी खत्म नहीं होती। चुनाव आयोग को कड़ाई से इन घोषणापत्र में किए गए वादे को पालन कराना चाहिए। और जो पार्टियां चुनाव घोषणा पत्र में किए गए वादे को लागू करने के लिए क़दम नहीं उठाती उनके खिलाफ उचित कार्रवाई करनी चाहिए।

राजेश कुमार

Monday, January 30, 2012

भरी दोपहरी सूरज डूबा....


बात अस्सी के दशक के शुरूआती सालों की है,,पटना के एक नामी होटल के कमरे में प्रदेश की राजनीति को क़रीब से जानने वाले दो लोगों के बीच गंभीर मंत्रणा हो रही थी,,एक शख्श जिनकी उम्र उस वक्त क़रीब 60 साल रही होगी,,सूबे के बांका ज़िले के कटोरिया विधानसभा के पूर्व विधायक जयप्रकाश मिश्र थे,,और दूसरे शख्श का नाम था दिग्विजय सिंह,,जो तत्कालीन समाजवादी आंदोलन में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा रहे थे,,अखबारों में लेखों के जरिए दिग्विजय सिंह उन दिनों बिहार और देश की जनता को अपील करने में लगे थे ,, दोनों के बीच लम्बी चली बातचीत का लब्बोलुआब ये था कि पटरी से उतरती जा रही बिहार की राजनीति को एक सशक्त लीडर की जरूरत है,,लिहाजा युवा नेता दिग्विजय सिंह को अब चुनाव में उतरना चाहिए और बांका संसदीय सीट से अपना दांव आजमाना चाहिए,,वो मुश्किल भरे दौर थे,,बिहार की राजनीति के लिए भी और देश की सियासत के लिए भी,,मंडल,,कमंडल और भूमंडल तीनों सियासी मैदान में कूदने की अंतिम रणनीति बना रहे थे,,और राष्ट्र की सियासत में एक बड़े भूचाल से पहले की शांति छाई थी,,ऊपर से नज़र कुछ नहीं आता था,,लेकिन भीतर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा था,,देश के गंभीर सियासतदां चिंतन मनन के काम में लगे हुए थे,,इसी कड़ी में बिहार की राजधानी के एक होटल के कमरे में सूबे की आने वाली सियासत की धुंधली तस्वीर उकेरी जा रही थी ,,बात भले ही अव्यवहारिक हो लेकिन अतार्किक नहीं थी,,वि·ाविद्यालय के छात्र संघों की संघर्षों के सच्चे प्रतिनिधियों को हमेशा से ही सियासत में आने का निमंत्रण यूं ही मिलता रहा है,,उस दिन एक बड़ी घटना घटी और देश के सबसे ऊर्जावान यूनिवर्सिटी के छात्र संघ के महासचिव रहे दिग्विजय सिंह ने जयप्रकाश मिश्र का न्योता स्वीकार कर लिया। इस वार्तालाप का जिक्र स्वर्गीय दिग्विजय सिंह ने बांका-भितिया रेल परियोजना के तहत भितिया में जंक्शन के शिलान्यास कार्यक्रम में हजारों लोगों के बीच मंच से किया था।

इस घटना के बाद बिहार और देश की नदियों में गुजरे वक्त के साथ जाने कितना पानी बह गया,, बोफोर्स को मुद्दा बनाकर वीपी सिंह ने मिस्टर क्लीन माने जाने वाले राजीव गांधी को जनता के बीच जाकर खुली चुनौती दे डाली ,, आपातकाल के बाद देश में फिर से कद्दावर विपक्ष करवट लेने लगा ,,राजा नहीं फकीर है के नारे उत्तर प्रदेश और बिहार की राजनीतिक गलियों से होते हुए दिल्ली पहुंचने को छटपटाने लगे ,, इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी को मिला बहुमत देखते ही देखते छू मंतर हो गया ,, और 1989 में वीपी सिंह दिल्ली की गद्दी पर काबिज हो गए,,उन दिनों जनता दल में कुछ युवा नेता बड़ी लगन से काम कर रहे थे,,उन्हीं में से एक काबिल नाम था बांका की धरती से होते हुए दिल्ली के सियासी गलियारों में अपनी पहचान बनाने वाले दिग्विजय सिंह का,,दिग्विजय अपने ओजस्वी भाषणों और कर्मठ प्रबंधन से सबके चहेते बनते जा रहे थे।

फिर शुरू हुआ जनता दल में चन्द्रशेखर की उपेक्षा का दौर,,यहीं से समाजवादी जनता पार्टी का बीजारोपण हुआ,,और दिग्विजय सिंह चन्द्रशेखर के कुछ करीबी सहयोगियों में शुमार हो गए। उसके बाद दिग्विजय राज्यसभा के सदस्य चुने गए ,,महज 35 साल की उम्र में ही उन्हें चार महीनों तक चली चन्द्रशेखर की सरकार में विदेश एवं वित्त उप मंत्री की महती जिम्मेदारी सौंपी गई।यही वो समय था जब दिग्विजय की देशव्यापी पहचान बननी शुरू हुई। इन्हीं दिनों दिग्विजय सिंह ने चालीस साल बनाम चार महीने के पोस्टरों के साथ बांका में अपनी चुनावी यात्रा का आगाज किया।
पहले चुनाव में दिग्विजय को करारी हार झेलने पड़ी,लेकिन बांका की पठारी धरती का मोह इस युवा क्षत्रिय के मन में समा गया। इसने पहले चुनाव में मिले मतों की गणना नहीं की,, बल्कि बांका की धरती की उन तमाम संभावनाओं को आत्मसात कर लिया जहां विकास की थोड़ी बहुत भी गुंजाईश दिखती थी। बहरहाल दूसरे ही चुनाव में दिग्विजय को मिले मतों की संख्या हजार से बढ़कर लाखों में पहुंच गई ,,हालांकि महज कुछ हजार वोटों से दिग्विजय जीत से दूर रह गए ,, लेकिन बांका संसदीय क्षेत्र की चुनावी गणित का केन्द्र बनने में सफलता हासिल की,, बाद को चार चुनावों में तीन बार बांका के लोगों ने दिग्विजय सिंह को ही अपनी पहली पसंद बनाया वाजपेयी की सरकार में रेल उद्योग और विदेश मंत्री भी बनाए गए ,, दो हजार चार का चुनाव हारने के बाद दिग्विजय झारखंड से राज्यसभा के लिए चुने गए ,, लेकिन बीच में ही इस्तीफा देकर बांका से निर्दलीय सांसद का चुनाव लड़ा और पार्टी की बजाए जनता का टिकट हासिल कर लिया।

इन बीस वर्षों में चाहे हार हो या जीत बांका में तो दिग्विजय का रूतबा कम हुआ ,,और ही दिग्विजय के दौरे,, अपनी तरफ से दिग्विजय ने बांका की बेबसी कम करने के हर संभव प्रयास किए,,बांका के लोगों को आजादी के साठ सालों के बाद ट्रेन की सीटी सुनाई दी ,,और ज़िले की स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार हुआ ,,लेकिन राजनीति का यह माहिर खिलाड़ी खेल के बीच में ही सब को छोड़कर चल दिया ,, अपनी हर सभाओं में दिग्विजय एक बात जरूर कहते थे कि हम टूट जाएंगे लेकिन झुकेंगे नहीं ,,एक दिन कम जियो लेकिन सिर उठाकर जियो,, लगता है सिर उठाकर चलने की ये आदत ऊपर वाले को पसंद गई। आज ऐसे लोग बचे ही कितने हैं ,, जो राजनीति को अपने स्वाभिमान से जोड़कर देखते हैं ,, ऐसे वक्त में जब राजनीति के पेशे में सब कुछ जायज है,, दिग्विजय जैसे स्वाभिमानी राजनीतिज्ञ का हम सबके बीच से जाना खलेगा,,किसी भी सियासतदां की अपनी मजबूरियां भी होती है,, लेकिन ऐसे पॉलीटिशियन कम ही होते हैं जो पत्रकारों और लेखकों से मित्रवत व्यवहार करते हैं,, जो अपने हर कार्यकर्ता के सुख दुख में साझीदार होते हैं,और जिनकी वाणी हमेशा ऐतिहासिक पात्रों का उदाहरण पेश करती है,,,विकास की बात आज हर कोई करता है लेकिन विकास करना सबके बूते की बात नहीं होती,, दिग्विजय आज की सियासत में उन कुछ गिने चुने नेताओं में से थे जिनका मक़सद लोगों को मुख्यधारा से जोड़ने का था,, दिग्विजय सिंह का परिवार गिद्धौर रियासत से ताल्लुक रखता था,,और उनका बचपन शाही परवरिश से गुजरा था,, लेकिन ऐसी परवरिश के बावजूद भी दिग्विजय ताउम्र लोकतांत्रिक समाजवाद के लिए संघर्षशील रहे,,उनका रहन सहन शाही था लेकिन उनके महल में हर जरूरतमंद के लिए जगह थी,,उनके पास बड़ी संपत्ति थी लेकिन उसमें ग़रीब लोगों का हिस्सा था। आज लोग पद के लिए जाने क्या क्या करते हैं ,, कुल मिलाकर दिग्विजय सिंह आज की राजनीति में एक मिसाल थे। लोग पद के लिए जाने कौन कौन सी सीमाएं पार कर जाते हैं। लेकिन पिछले आम चुनाव में बांका से संसदीय चुनाव लड़ने से पहले दिग्विजय सिंह ने जिस तरह राज्य सभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया उसका साहस बड़े से बड़े राजनेताओं में देखने को नहीं मिलता। दरअसल कर्मठता आज की सियासत में आने की अनिवार्य शर्त तो है लेकिन सियासत में बने रहने के लिए यह जरूरी नहीं रह जाती ,, लेकिन फिर भी बांका की धरती से दिग्विजय सिंह जैसा कोई निकलता है जो भारतीय राजनीति की तमाम कसौटियों पर खरा उतरे।
यूं तो मनुष्य का पूरा जीवन ही अन्तरद्वन्द्वों से गुजरता रहता है,,और मन में चल रहे अन्तरद्वन्दों के बीच या तो लोग हालात से समझौता कर लेते हैं या आसान रास्ता अख्तियार कर लेते हैं ,,पिछले कुछ सालों से दिग्विजय सिंह का जीवन भी इसी तरह के अन्तरद्वन्द्वों के बीच गुजर रहा था ,, पहले वे भाजपा के साथ हुए गठबंधन और जदयू और भाजपा के बीच विचारधारा की मिटती दूरी से आहत थे,,उसके बाद नीतीश से विवादों के चलते बनी बनाई पार्टी छोड़ने की असहाय पीड़ा,,अब पिछले कुछ दिनों से तो कांग्रेस से नजदीकियों की भी चर्चा चल रही थी,,ये ऐसे अन्तरद्वन्द्व थे जिनके आगे दिग्विजय सिंह के अन्तर्मन ने समर्पण नहीं किया,,लिहाजा ऊपर की राजनीति तो ठीक चलती रही लेकिन दिग्विजय का अन्तर्मन इन संघर्षों में जूझता रहा,,और यही कारण है कि चिकित्सा जगत भले ही दिग्विजय की मौत का कारण ब्रोन हेम्ररेज बता रहा हो लेकिन मेरे जैसा सुधी दर्शक बिना माईक के भाषण देने वाले दादा दिग्विजय सिंह की मौत का कारण केवल शारीरिक नहीं मान सकता।

दिग्विजय सिंह बिहार की सियासत के बड़े नेता थे ,,लेकिन उनका बड़प्पन उनके शानो शौकत में नहीं था,, दिग्विजय का बड़प्पन उनकी सादे व्यवहार में था,,बात नब्बे के दशक के शुरूआती सालों की है,,दिग्विजय सिंह बांका के दौरे पर थे,,बारिश का मौसम था लिहाजा दिग्विजय सिंह की जीप हमारे गांव तक नहीं पहुंच पाई,,और गांव से आधा किलोमीटर दूर नदी के उस पार रह गई ,, फिर दादा ने बरसाती नदी को पार किया,,उस पार का सफर खुद से मोटरसाईकिल चलाकर पूरा किया ,, फिर बारी आई भोजन की,,तो भोजन में परोसा गया दही चूड़ा और नैनुआ की सब्जी को पूरे चाव से खाया था,,। दिग्विजय सिंह का निधन देश और बिहार की राजनीति की एक बड़ी क्षति है,,लेकिन सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचा है बांका को जहां दिग्विजय के रुप में विकास का सपना ही खो गया है। दिग्विजय सांसद रहते या न रहते ये ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं था लेकिन बांका के सर्वांगिण विकास के लिए दिग्विजय की उपस्थिति अनिवार्य थी।
राजेश कुमार